चार खेमे चौंसठ खूंटे:हरिवंशराय बच्चन

यह कि तुम जिस ओर जाओ
चलूँ मैं भी,
यह कि तुम जो राह थामो
रहूँ थामे हुए मैं भी,
यह कि कदमों से तुम्हारे
कदम अपना मैं मिलाए रहूँs..।
यह कि तुम खींचो जिधर को
खिंचूं,
जिससे तुम मुझे चाहो बचाना
बचूँ:
यानी कुछ न देखूँ,कुछ न सोचूँ
कुछ न अपने से करूँ–
मुझसे न होगा:
छूटने को विलग जाने,
ठोकरे खाने: लुढ़कने, गरज,
अपने आप करने के लिए कुछ
विकल चंचल आज मेरी चाह।

–यह कि अपना लक्ष्य निश्चित मैं न करता,
यह कि अपनी राह मैं चुनता नहीं हूँ,
यह कि अपनी चाल मैंने नहीं साधी,
यह कि खाई-खन्दकों को
आँख मेरी देखने से चूक जाती,
यह कि मैं खतरा उठाने से
हिचकता-झिझकता हूँ,
यह कि मैं दायित्व अपना
ओढ़ते घबरा रहा हूँ–
कुछ नहीं ऐसा।
शुरू में भी कहीं पर चेतना थी,
भूल कोई बड़ी होगी,
तुम सम्भाल तुरंत लोगे;
अन्त में भी आश्वासन चाहता हूँ
अनगही नहीं है मेरी बाँह।

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